भगवान श्री गणेश कैसे बने 'प्रथम पूज्य', 4 कथाएँ

भारतीय संस्कृति में भगवान श्रीगणेश को प्रथम पूज्य माना जाता है. 33 कोटिश देवी-देवताओं में प्रथम पूज्य होना, भगवान गणेश की महिमा को स्वयं ही प्रकट कर देता है.

Story of The Birth of Ganesha in Hindi, Ganesh Utsav 2021

यूं तो भगवान गणेश के प्रथम पूज्य होने के लिए कई रोचक कथाएं हैं, किन्तु यहाँ हम आपको गणेशजी के प्रथम पूज्य होने से सम्बंधित चार कथाएँ बताएँगे, जिन्हें जानकर आप प्रथम पूज्य श्रीगणेश जी की भक्ति में सराबोर हो जायेंगे, तो आपको भारतीय संस्कृति के बारे में गहराई से जानने को भी मिलेगा, जो सदियों, शताब्दियों और युगों से ‘विश्वगुरु’ के पद पर विभूषित है.

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आइये, इस सन्दर्भ में हम भगवान श्रीगणेश के प्रथम पूज्य होने की पहली कथा प्रारंभ करते हैं...

'मोदक' एवं श्रीगणेश के प्रथम पूज्य होने की कथा

कहते हैं कि एक बार भूख लगने पर भगवान श्रीगणेश अपनी माता पार्वती से कुछ खाने को मांगने लगे. ऐसे में मां पार्वती ने अमृत से तैयार एक दिव्य मोदक उत्पन्न किया. 

उस मोदक को देखकर न केवल गणेश भगवान, बल्कि माता पार्वती एवं शंकर भगवान के बड़े पुत्र कार्तिकेय महाराज भी माता से मोदक मांगने लगे. 

परन्तु मोदक तो एक ही था!

तब माता पार्वती ने अमृत से तैयार उस मोदक की कथा दोनों बालकों को सुनाई, और कहा कि जो धर्म का पालन करते हुए समस्त तीर्थों का भ्रमण करके सबसे पहले मेरे पास आएगा, उसे ही यह मोदक प्रदान करूंगी.

बस फिर क्या था, भगवान कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर सवार होकर सभी तीर्थों का भ्रमण करने चल पड़े, जबकि भगवान गणेश का वाहन मूषक था, और इसलिए उन्होंने एक युक्ति निकाली.

भगवान गणेश ने श्रद्धापूर्वक माता पिता को एक जगह बिठा कर उनकी पूजा-अर्चना की, और उनकी परिक्रमा करके जल्द ही उनके सम्मुख हाथ जोड़कर भक्ति भाव से खड़े हो गए. 

तब माता पार्वती ने प्रसन्न होकर भगवान गणेश को वह मोदक दे दिया, और तभी से हम माना जाता है कि संपूर्ण तीर्थों, यात्राओं, संपूर्ण देवताओं के पूजन, यज्ञ-अनुष्ठान मनुष्य चाहे जो भी कर ले, किंतु माता पिता की सेवा और पूजन के 16वें अंश के बराबर भी इन सभी का पुण्य नहीं हो सकता. मतलब माता-पिता की सेवा सर्वश्रेष्ठ है.

ऐसे में माता पार्वती ने न केवल मोदक गणेश को दिया, बल्कि उन्हें आशीर्वाद भी दिया कि प्रत्येक यज्ञ में सबसे पहला पूजन उन्हीं का होगा. तबसे भगवान गणेश का प्रथम पूजन समस्त लोकों में स्वीकार्य हो गया.

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द्वितीय कथा: देवताओं में श्रेष्ठता की प्रतिस्पर्धा एवं भगवान श्रीगणेश की विजय

भगवान गणेश के प्रथम पूज्य माने जाने की दूसरी कथा सभी देवताओं में उत्पन्न श्रेष्ठता की प्रतिस्पर्धा से संबंधित है. ऐसा माना जाता है कि एक बार सभी देवताओं में आपस में विवाद हो गया कि सबसे श्रेष्ठ कौन है?

आखिर किसी भी यज्ञ-अनुष्ठान में सबसे पहले किस देवता की पूजा होनी चाहिए?

तभी त्रिदेवों ने मिलकर यह निश्चित किया कि जो समस्त ब्रह्मांड का भ्रमण करके सबसे पहले निश्चित स्थान पर वापस आ जाएगा, उसे ही सबसे पहले पूजा प्राप्त होगी.

ऐसे में सभी देवता अपने-अपने वाहन पर ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाने निकल पड़े. ऐसा माना जाता है कि मूषक की सवारी होने के कारण भगवान श्री गणेश ने अपने माता-पिता, शंकर भगवान एवं देवी पार्वती की परिक्रमा करते हुए सबसे पहले ब्रह्माण्ड भ्रमण का पुण्य अर्जित कर लिया.

बाकी सभी देवताओं के पास तीव्र गति वाले वाहन (सवारियां) ज़रूर थे, किन्तु प्रतियोगिता में अपनी कुशाग्र बुद्धि एवं मातृ-पितृ भक्ति के कारण श्री गणेश की ही विजय हुई. ऐसे में सभी देवताओं ने भगवान गणेश को निर्विवाद रूप से प्रथम पूज्य मान लिया और तब से ही जगत में प्रथम पूज्य श्री गणेश की महिमा की सर्वत्र पूजा अर्चना की जाती है.

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तृतीय कथा: जब स्वयं भगवान शंकर ने श्रीगणेश की पूजा की 

भगवान श्री गणेश के प्रथम पूज्य होने की एक और कथा बेहद चर्चित है, और उसके अनुसार ऐसा माना जाता है कि एक बार भोले भंडारी शिव शंकर, त्रिपुरासुर नामक राक्षस से युद्ध कर रहे थे.

अपनी तमाम शक्तियों के प्रयोग के बावजूद शंकर भगवान को विजय नहीं मिल रही थी, और तभी आकाशवाणी हुई कि भगवान शंकर को तभी त्रिपुरासुर नामक राक्षस से विजय मिलेगी, जब वह गणेश जी का पूजन करेंगे.

गणेश पुराण में वर्णित इस कथा के अनुसार भगवान शंकर ने तब युद्ध रोककर गणेश जी का पूजन अर्चन किया और उसके बाद त्रिपुरासुर से पुनः युद्ध करने गए. तत्पश्चात ही त्रिपुरासुर नामक असुर का वध संभव हो सका था और ऐसा माना जाता है कि न केवल भगवान शंकर, बल्कि तमाम देवी देवता, यहां तक कि मानव और असुर तक गणेश जी की प्रथम पूजा करते हैं, और अपने मंतव्य में सफल हो पाते हैं.

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चतुर्थ कथा: शनि देव का प्रकोप

भगवान गणेश की प्रथम पूजा से संबंधित एक कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी वर्णित है, जिसके अनुसार भगवान गणेश के जन्मदिन पर पधारे शनि देव ने जैसे ही उन्हें देखा, वैसे ही श्रीगणेश का शीश, धड़ से अलग होकर आकाश में उड़ गया. 

तत्क्षण ही भगवान विष्णु अपने वाहन गरुड़ पर जाकर गज मस्तक लेकर आए, और माना जाता है कि तब भगवान शंकर ने प्राणदायी मंत्रोच्चार से गणेश जी को पुनर्जीवित कर दिया एवं उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम्हें पुनर्जीवन देने के पश्चात मैंने सबसे पहली तुम्हारी पूजा की है, इसीलिए तुम सबसे प्रथम पूज्य और योगेंद्र कहलाओगे.

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इस तरह की अनेक कथाएं भगवान श्री गणेश के बारे में प्रचलित हैं, किंतु इस बात में रत्ती भर भी मतभिन्नता नहीं है कि भगवान गणेश जी सनातन धर्म में सर्वप्रथम पूजनीय माने जाते हैं.

किसी भी शुभ कार्य के समय भगवान गणेश की पूजा निर्विवाद रूप से सबसे पहले की जाती है, और तभी कार्य की सफलता सिद्ध होती है. 

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