बेशक मैं दिखती नहीं हूं poem by Anamika

 

बेशक मैं दिखती नहीं हूं
पर मेरा वजूद है,
यूं कह लो मैं वो रीढ़ की हड्डी हुं,
जिसने तुम्हारी शोहरत संभाल रखी है,
या कह लो की मैं हूं कमान कोई
जिसने तुम्हारी खिंचाव की डोर बांध रखी है।।

छोटी छोटी चीजों में हूं मैं
बिखरी नहीं हूं, पर सिमटी भी नहीं जा सकती
तुम्हारी चादर की सिलवटों से लेकर
तुम्हारे जीवन के उतार चढ़ाव में हूं।।

ढूंढोगे गर कभी मुझे अपनी जिंदगी में
जिंदगी की हर जोड़ में हू मै
पूर्ण नहीं तो टुकड़ों में ही सही,
समय के हर मोड़ में हूं मैं।।

मुझे तवज्जो न दो
में तो ख़ुद अपूर्ण हूं
बस यूं समझ लो
Broken but beautiful सा कर्ण हूं।।


✍️ अनामिका


Web Title Anamika


आत्मनिर्भर दिवाली की दो प्रतियोगिताओं (कविता-प्रतियोगिता एवं लेखन-प्रतियोगिता) में भाग लें. 2,100/- का प्रथम पुरस्कार... अपनी रचनायें जल्दी भेजें ... 

vayam.app




Post a Comment

Previous Post Next Post