"महिला- प्रधान समाज का निर्माण" poem by Omisha Kushwaha

 "महिला- प्रधान समाज का निर्माण"


सोच पिंजड़ा है, और मन है कैद पंछी,
चलो ये रिवायतें तोड़ खुद को रिहा किया जाए।

सोने की थाल और चाँदी की जाल छोड़कर,
दूर कहीं आसमाँ में अपने पंख खोलकर, थोड़ा खुलकर जिया जाए।

तितलियों की तरह कोमल नहीं, थोड़ा कठोर बनकर,
फूलों से नहीं, चलो काँटों से बैर मोल लिया जाए।

पूरी तरह आज़ाद होकर, बेबस सारी बंदिशें तोड़कर,
किसी और का नहीं खुद को सिर्फ़ अपना ही नाम दिया जाए।

पलकों तले आँसू नहीं, फ़लक की एक झलक लेकर,
इस बेरहम ज़माने को दिखा, उनकी अंधी आँखें खोल दिया जाए।

हाथों में जो चूड़ियाँ हैं, सिर्फ़ चूड़ियाँ नहीं ये बेड़ियाँ हैं,
चलो इन्हें कहीं दूर फेंक, ज़ुल्म की खनक से दूर किया जाए।

पायल से घायल हों अगर पैर, तो इन्हें भी उतार,
अपने कदमों को मंज़िल की ओर राह दिखा मोड़ लिया जाए।

बनकर एक अबला नारी, और सिर्फ़ रेशम की साड़ी ही नहीं,
आज चलो खादी पहनकर, अपनी सख़्त पहचान बना लिया जाए।

अब सिर्फ़ दिन में ही नहीं, रात में भी बेखौफ़ जिया जाए,
और इन आबरू से खेलते कातिलों को चलो बर्बाद किया जाए।

अन्याय के विरुद्ध एक युद्ध आरंभ किया जाए,
और एक नया जहाँ बना महिला- प्रधान समाज का निर्माण किया जाए।

-Omisha Kushwaha




https://youtu.be/EBkAJnAy9OE

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